Short Story – Ek Kisaan

बिक रहा है पानी, पवन बिक न जाए,
बिक गयी है धरती, गगन बिक न जाए

चाँद पर भी बिकने लगी है जमीं,
डर है की सूरज की तपन बिक न जाए,
हर जगह बिकने लगी है स्वार्थ नीति,
डर है की कहीं धर्म बिक न जाए,
देकर दहॆज ख़रीदा गया है अब दुल्हे को,
कही उसी के हाथों दुल्हन बिक न जाए,

हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता,
कही इन्ही के हाथों वतन बिक न जाए,
सरे आम बिकने लगे अब तो सांसद,
डर है की कहीं संसद भवन बिक न जाए,

आदमी मरा तो भी आँखें खुली हुई हैं,
डरता है मुर्दा, कहीं कफ़न बिक न जाए।

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About Ek Kisaan

Ek Kisaan is a blog which pays a tribute to the glorious life of Thousands Indian Farmers who suffer pain from years of years...But no one help them!
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